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महंगी कैंसर दवाओं की कम खुराक जांचने की मांग तेज़

नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री ने FDA से मंज़ूर एक साल की निवोलुमैब थेरेपी छह महीने में ही छोड़ दी। अब वे महंगी कैंसर दवाओं की कम खुराक जांचने के अध्ययन की मांग कर रहे डॉक्टरों, शोधकर्ताओं और मरीज़ों के बढ़ते समूह में शामिल हो गए हैं।

नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री चक मैंस्की को 2022 में एडवांस्ड मेलानोमा के इलाज के लिए छह महीने तक हर महीने निवोलुमैब (ओप्दिवो) की खुराक दी गई। अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) से मंज़ूर प्रोटोकॉल के मुताबिक यह इलाज पूरे एक साल चलना था, लेकिन कैंसर के लक्षण खत्म होते ही मैंस्की ने इलाज बंद कर दिया। दवा से उनकी थायरॉइड ग्रंथि को नुकसान पहुंचा, जिसके चलते उन्हें जीवन भर दवा लेनी पड़ेगी, और आंखों, होंठों व मुंह में गंभीर सूखापन भी हुआ। पूरे एक साल की खुराक ही सही क्यों है, यह उनके डॉक्टर भी नहीं समझा सके; डॉक्टर ने बस इतना कहा कि यह FDA से मंज़ूर है, इसलिए यही इस्तेमाल किया जाता है।

कनाडा, इज़राइल और स्वीडन के डॉक्टर पहले से ही निवोलुमैब और उससे मिलती-जुलती दवा पेम्ब्रोलिज़ुमैब (कीट्रूडा) की खुराक अमेरिकी लेबल में बताई गई मात्रा से कम या कम समय के लिए देते आए हैं। मैंस्की का फैसला इसी सोच से मेल खाता था। भारत में कैंसर विशेषज्ञों ने पाया कि निवोलुमैब की लेबल पर लिखी खुराक के बारहवें हिस्से जितनी मात्रा भी कई तरह के कैंसर पर असरदार साबित हुई। इसके बाद से डॉक्टरों, शोधकर्ताओं और मरीज़ों का एक बढ़ता समूह महंगी कैंसर दवाओं की सबसे कम ज़रूरी खुराक तय करने के लिए खुराक-अनुकूलन अध्ययन कराने की मांग कर रहा है, और मैंस्की भी इसमें शामिल हो गए हैं।

इस मांग की एक वजह इलाज का खर्च भी है। KFF के एक सर्वे में अमेरिका के 43% वयस्कों ने बताया कि पिछले साल उन्होंने खर्च के कारण दवा नहीं ली। मेडिकेयर के मरीज़ों पर हुए 2022 के वैंडरबिल्ट यूनिवर्सिटी के अध्ययन में पाया गया कि कैंसर की 30% दवा पर्चियां दवा की दुकान से खरीदी ही नहीं गईं। 29 महंगी कैंसर दवाओं पर हुए एक अध्ययन के मुताबिक, अगर 2024 में सिर्फ ज़रूरी न्यूनतम खुराक ही इस्तेमाल की जाती, तो अमेरिका करीब $31 बिलियन बचा सकता था। मायो क्लिनिक कॉम्प्रिहेंसिव कैंसर सेंटर के डॉ. मैथ्यू गोएट्ज़ ने कहा कि फैसले हमेशा मरीज़ों की सबसे बड़ी ज़रूरत को ध्यान में रखकर नहीं लिए जाते, और मुनाफा भी एक वजह है।

इन दवाओं से कंपनियों को भारी कमाई होती है। पिछले साल मर्क कंपनी ने अकेले पेम्ब्रोलिज़ुमैब से करीब $32 बिलियन की बिक्री की; यह दवा 40 से ज़्यादा तरह के कैंसर के लिए FDA से मंज़ूर है और मर्क की कुल दवा बिक्री का करीब आधा हिस्सा इसी से आया। वहीं ब्रिस्टल मायर्स स्क्विब को निवोलुमैब से $10 बिलियन की कमाई हुई। शिकागो यूनिवर्सिटी मेडिसिन के डॉ. मार्क रटेन ने कहा, "पेम्ब्रोलिज़ुमैब अमेरिकी अस्पतालों की जीवनरेखा है।" इंडियाना यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन की डॉ. कैथी मिलर मेटास्टेटिक स्तन कैंसर की मरीज़ों को लेबल पर लिखे 600 मिलीग्राम की जगह रोज़ 400 मिलीग्राम किस्काली तीन हफ्ते देकर एक हफ्ते का अंतराल देती हैं। उनका कहना है कि बीमा कंपनियां अक्सर उनकी कम खुराक वाली पर्चियों पर आपत्ति जताती हैं।

मर्क की प्रवक्ता जूली कनिंघम ने कहा कि दवा की खुराक से जुड़ी सिफारिशें व्यापक परीक्षणों के आधार पर तय की गई हैं। उन्होंने कहा कि जिन बदलावों का इसी तरह अध्ययन नहीं किया गया है, वे "इलाज के असर को कमज़ोर कर सकते हैं।"

शब्दों की व्याख्या

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