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सतह पर फिसलती आवेशित पानी की बूंदें चुपचाप धातु को खा सकती हैं

पत्तियों और शीशे जैसी सतहों पर फिसलते समय विद्युत आवेश पाने वाली पानी की बूंदें यह आवेश धातु को देकर, सुरक्षात्मक परत होने के बावजूद, संक्षारण पैदा कर सकती हैं, एक नए अध्ययन में पाया गया है।

चरण दर चरण

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    पानी की बूंद सतह पर फिसलती है

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    बूंद विद्युत आवेशित हो जाती है

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    लेपित धातु पर गिरने पर आवेश स्थानांतरित होता है

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    आवेश परत को भेदकर नीचे की धातु को संक्षारित करता है

पानी की बूंदें केवल किसी सतह पर फिसलने से ही विद्युत आवेशित हो सकती हैं। सही विद्युत गुणों वाली सामग्री, जैसे धातुओं, पर गिरने पर यह आवेश सुरक्षात्मक परत होने के बावजूद संक्षारण पैदा कर सकता है, ऐसा 26 अगस्त को नेचर (Nature) पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन बताता है। बादलों, आंधी-तूफान और झरनों में भी पानी आवेश ग्रहण कर सकता है, इसलिए यह प्रभाव व्यापक हो सकता है।

संक्षारण से पहले से ही बड़ा आर्थिक नुकसान होता है: जंग सहित इस व्यापक प्रकार की क्षति ने 1999 में अकेले अमेरिकी ऑटोमोबाइल उद्योग को 30 अरब डॉलर से अधिक का नुकसान पहुंचाया था। वैश्विक लागत खरबों में आंकी जाती है। पहले के अध्ययनों ने इस नुकसान का कारण मुख्यतः पानी की बूंदों के भौतिक प्रभाव और उनमें मौजूद अम्ल जैसे थोड़े संक्षारक यौगिकों को माना था।

जर्मनी के मेंज़ स्थित मैक्स प्लांक पॉलिमर रिसर्च इंस्टीट्यूट के भौतिक विज्ञानी झोंगयुआन नी ने इस अध्ययन का नेतृत्व किया। शुरुआती प्रयोगों में सैकड़ों बूंदों के बाद भी उन्हें कोई नुकसान नहीं दिखा। तय समय से अधिक देर तक प्रयोग चलने देने पर ही उन्हें नुकसान के संकेत मिले, जिसने आगे जांच के लिए प्रेरित किया। टीम ने पाया कि नुकसान दिखने के लिए सैकड़ों नहीं, बल्कि हज़ारों बूंदें चाहिए थीं।

शोधकर्ताओं ने पत्तियों जैसी सतहों पर फिसलाकर आवेशित की गई पानी की बूंदों को टेफ्लॉन-लेपित तांबे पर गिराया। इन आवेशित, फिसली हुई बूंदों से टकराया हर नमूना माइक्रोस्कोप में क्षतिग्रस्त दिखा, जबकि सीधे गिराई गई बूंदों वाले नमूने में कोई नुकसान नहीं था। एक अन्य माइक्रोस्कोपी तकनीक से पता चला कि आवेशित बूंदें टेफ्लॉन को भेदकर नीचे के तांबे को संक्षारित कर चुकी थीं। पॉलीस्टाइरीन शीशे से लेपित तांबे और सोने के नमूनों पर भी वैसा ही नुकसान दिखा।

अध्ययन से जुड़े न रहे जर्मनी के स्टटगार्ट विश्वविद्यालय के भौतिक विज्ञानी स्टेफान वेबर ने कहा कि यह शोध बेहतर संक्षारण-रोधी परतें बनाने का रास्ता खोल सकता है। नी ने कहा कि हर आवेशित बूंद का असर छोटा है और इससे घबराने की ज़रूरत नहीं, लेकिन वर्षों तक मौसम के संपर्क में रहने वाले स्मारकों, मशीनों और बुनियादी ढांचे पर ये असर जमा होकर बड़ा हो सकता है।

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