गंभीर टाइप 2 अस्थमा से मस्तिष्क की संरचना में बदलाव जोड़े गए: अध्ययन
गंभीर टाइप 2 अस्थमा वाले 50 और अच्छी तरह नियंत्रित अस्थमा वाले 25 लोगों पर हुए अध्ययन में मस्तिष्क का सफेद द्रव्य कम व्यवस्थित पाया गया, साथ ही हिप्पोकैम्पस और टेम्पोरल लोब के आकार में भी अंतर मिला। यह बदलाव टाइप 2 सूजन के स्तर से जुड़ा था, हालांकि…
गंभीर टाइप 2 अस्थमा से पीड़ित लोगों के मस्तिष्क की संरचना में, अच्छी तरह नियंत्रित अस्थमा वाले लोगों की तुलना में मापने योग्य अंतर देखा गया है। यह जानकारी स्पेन के बार्सिलोना में हुई यूरोपियन रेस्पिरेटरी सोसाइटी सम्मेलन (ERS) में प्रस्तुत एक अध्ययन से मिली है। यह अध्ययन ब्रिटेन के एनआईएचआर बायोमेडिकल रिसर्च सेंटर, ब्रिस्टल और सिटी सेंट जॉर्जेज़, यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन के शोधकर्ताओं के नेतृत्व में किया गया। यह संकेत देता है कि गंभीर अस्थमा पैदा करने वाली सूजन का असर सिर्फ फेफड़ों तक सीमित नहीं हो सकता।
शोधकर्ताओं ने 50 गंभीर टाइप 2 अस्थमा रोगियों की तुलना, अच्छी तरह नियंत्रित हल्के या मध्यम टाइप 2 अस्थमा वाले 25 लोगों से की। इसके लिए उन्होंने चुंबकीय अनुनाद इमेजिंग स्कैन (MRI) की एक उन्नत तकनीक का इस्तेमाल किया, जिसे क्वासी-डिफ्यूज़न इमेजिंग (QDI) कहा जाता है। यह तकनीक मस्तिष्क के सफेद द्रव्य की सूक्ष्म संरचना को उजागर करती है; सफेद द्रव्य मस्तिष्क के अलग-अलग हिस्सों को जोड़ने वाला संचार नेटवर्क है, जो संकेतों को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाता है। गंभीर अस्थमा वाले लोगों का सफेद द्रव्य कम व्यवस्थित पाया गया, और हिप्पोकैम्पस तथा टेम्पोरल लोब के आकार में भी अंतर देखा गया।
सफेद द्रव्य में हुए बदलाव की मात्रा, टाइप 2 सूजन के स्तर से जुड़ी थी। टाइप 2 सूजन वह अत्यधिक सक्रिय प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया है, जो गंभीर अस्थमा का कारण बनती है। ब्रिस्टल एकेडमिक रेस्पिरेटरी यूनिट में एनआईएचआर अकादमिक क्लिनिकल लेक्चरर डॉ. जॉर्ज नावा ने बताया कि सभी प्रतिभागियों में अधिक सूजन वाले लोगों के मस्तिष्क के सफेद द्रव्य में ज़्यादा अंतर पाया गया। उन्होंने कहा, 'यह अध्ययन यह साबित नहीं करता कि सूजन ही इन बदलावों का कारण है, लेकिन यह ज़रूर संकेत देता है कि इसके पीछे एक जैविक संबंध हो सकता है, जिसकी और जांच ज़रूरी है।'
शोधकर्ता अब यह पता लगा रहे हैं कि सूजन को लक्षित करने वाले इलाज के बाद ये मस्तिष्क संबंधी अंतर बदलते हैं या नहीं। ब्रिस्टल विश्वविद्यालय में रेस्पिरेटरी मेडिसिन के प्रोफेसर और इस अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता जेम्स डॉड ने कहा कि टीम को उम्मीद है कि उनका जारी शोध यह बताएगा कि क्या इन बदलावों को रोका या पलटा जा सकता है।
डॉ. अपोस्तोलोस बोसियोस इस शोध में शामिल नहीं थे। वे यूरोपियन रेस्पिरेटरी सोसाइटी की एयरवे डिज़ीज़, अस्थमा, क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिज़ीज़ (COPD) और क्रॉनिक कफ असेंबली के प्रमुख हैं। वे स्वीडन के कैरोलिंस्का इंस्टिट्यूट में रेस्पिरेटरी मेडिसिन के एसोसिएट प्रोफेसर भी हैं। बोसियोस ने बताया कि टाइप 2 अस्थमा सबसे आम अस्थमा प्रकार है, और लगभग 5% से 10% मरीज़ ही गंभीर बीमारी विकसित करते हैं।
शब्दों की व्याख्या
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