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ब्रिस्बेन की बुलिम्बा क्रीक में सबसे ज़्यादा ख़तरनाक माइक्रोप्लास्टिक

ब्रिस्बेन की तीन नदियों में हुए अध्ययन में बुलिम्बा क्रीक में सबसे ज़्यादा खतरनाक माइक्रोप्लास्टिक पाया गया। शोधकर्ताओं के अनुसार पॉलिमर का प्रकार ही सबसे बड़ा खतरा तय करता है।

ऑस्ट्रेलिया के ब्रिस्बेन में तीन नदियों पर हुए अध्ययन में पाया गया कि बुलिम्बा क्रीक में सबसे ज़्यादा खतरनाक माइक्रोप्लास्टिक मौजूद है। क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी (QUT) के शोधकर्ताओं ने केड्रॉन ब्रुक, बुलिम्बा क्रीक और एनोगेरा क्रीक की तलछट में माइक्रोप्लास्टिक के खतरे को आंकने के लिए एक नया ढांचा बनाया। यह अध्ययन मरीन पॉल्यूशन बुलेटिन पत्रिका में प्रकाशित हुआ।

यह ढांचा तीन बातों को जोड़ता है: तलछट में कितना माइक्रोप्लास्टिक है, उसका पॉलिमर प्रकार कितना खतरनाक है, और इन दोनों से बनने वाला पारिस्थितिक खतरा। QUT के रसायन विज्ञान विभाग की पीएचडी छात्रा और मुख्य लेखिका हेशानी मुदालिगे ने बताया कि विश्लेषण में पाया गया कि खास पॉलिमर प्रकारों का खतरा, माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा से कहीं ज़्यादा असर डालता है। पीवीसी (PVC, एक आम कठोर प्लास्टिक), पीएमएमए (PMMA, एक ऐक्रेलिक प्लास्टिक) और पॉलिएस्टर — इन तीन पॉलिमर प्रकारों को सबसे ज़्यादा खतरनाक पाया गया। बुलिम्बा क्रीक खतरनाक माइक्रोप्लास्टिक और पारिस्थितिक खतरे दोनों में सबसे आगे रहा, जबकि केड्रॉन ब्रुक में कुल माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा सबसे ज़्यादा थी।

मुदालिगे ने बताया कि जब खाद्य श्रृंखला के निचले स्तर के जीव पीवीसी कण खाते हैं, तो उनमें मौजूद ज़हरीले रसायन मछलियों की वृद्धि, प्रजनन और जीवित रहने की क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। पीएमएमए खाने वाले जीवों में शारीरिक तनाव, कम भोजन-क्षमता और ऊर्जा हानि हो सकती है। माइक्रोप्लास्टिक पर्यावरण से प्रदूषक सोख सकते हैं और अपने भीतर मौजूद रसायन छोड़ सकते हैं। ये मुख्यतः समुद्री भोजन के ज़रिए मानव शरीर में पहुंचते हैं और रक्त-संचार व प्रतिरक्षा प्रणाली तथा तंत्रिका-क्षरण विकारों से जुड़े हो सकते हैं।

हर नदी जिन औद्योगिक, वाणिज्यिक और आवासीय भूमि-उपयोगों से होकर गुज़रती है, उसे दर्शाने के लिए शोधकर्ताओं ने हर नदी में छह स्थानों से, साल भर में चार बार तलछट के नमूने लिए। नतीजे दिखाते हैं कि भूमि-उपयोग माइक्रोप्लास्टिक के खतरे के वितरण में अहम भूमिका निभाता है। टीम का कहना है कि इससे पर्यावरण प्रबंधकों को सफाई और सुरक्षा प्रयासों को सबसे ज़रूरी जगहों पर केंद्रित करने में मदद मिलेगी।

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