मुड़ने पर बिजली बनाता है हीरा: हॉन्ग कॉन्ग के शोध का बड़ा दावा
हॉन्ग कॉन्ग विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने पाया कि पतली, मोड़ी जा सकने वाली हीरे की झिल्ली मुड़ने पर मापने योग्य वोल्टेज बनाती है, जिसने हीरे के पीज़ोइलेक्ट्रिक न होने की सदी पुरानी धारणा को चुनौती दी है।
चरण दर चरण
- 1
एक्सफोलिएशन से पतली हीरे की झिल्ली बनाना
- 2
झिल्ली को मोड़ना
- 3
स्थिर वोल्टेज संकेत मापना
- 4
ग्रेन बाउंड्री आवेश तक कारण पहुंचाना
हॉन्ग कॉन्ग विश्वविद्यालय (HKU) के शोधकर्ताओं ने पाया है कि पतली, लचीली हीरे की झिल्लियां मुड़ने पर बिजली पैदा कर सकती हैं। यह एक सदी से भी अधिक समय से चली आ रही वैज्ञानिक धारणा को चुनौती देता है। इस शोध का नेतृत्व HKU के इलेक्ट्रिकल एंड कंप्यूटर इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर ज़ीक्विन चू और मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर युआन लिन ने किया।
1900 के दशक की शुरुआत से ही हीरे को गैर-पीज़ोइलेक्ट्रिक पदार्थ माना जाता रहा है, यानी यह उम्मीद नहीं थी कि यांत्रिक रूप से मोड़े या दबाए जाने पर यह वोल्टेज पैदा करेगा। इस धारणा ने इंजीनियरिंग में हीरे के इस्तेमाल को सीमित कर दिया था। हीरे में कठोरता, रासायनिक स्थिरता और उच्च ऊष्मा चालकता जैसी खूबियां हैं। इसमें चौड़ा इलेक्ट्रॉनिक बैंडगैप भी है। फिर भी, हीरे का इस्तेमाल आमतौर पर सूक्ष्म-यांत्रिक-विद्युत प्रणालियों (MEMS — चिप बनाने की तकनीकों से बने बेहद छोटे यांत्रिक उपकरण) में सिर्फ एक निष्क्रिय ढांचागत सहारे के तौर पर होता रहा।
अत्यधिक मोड़ के तहत हीरा अलग व्यवहार कर सकता है या नहीं, यह जांचने के लिए HKU टीम ने एक नई विधि अपनाई। इसे 'एज एक्सफोलिएशन' कहा जाता है, जिसके ज़रिए एक पतली, लचीली पॉलीक्रिस्टलाइन हीरे की झिल्ली बनाई गई — यानी कई छोटे-छोटे हीरे के क्रिस्टलों से बनी एक शीट। यह सामान्य ठोस हीरे से कहीं ज़्यादा मुड़ सकती है। जब शोधकर्ताओं ने इस झिल्ली को मोड़ा, तो उन्होंने स्थिर वोल्टेज संकेत मापे। वातावरण से हस्तक्षेप और सतहों के रगड़ने से पैदा होने वाले ट्राइबोइलेक्ट्रिक प्रभाव को खारिज करने के लिए बार-बार मैकेनिकल परीक्षण किए गए। इन्होंने पुष्टि की कि वोल्टेज हीरे से ही उत्पन्न हो रहा था।
इसका कारण जानने के लिए किए गए 'फर्स्ट-प्रिंसिपल्स' गणितीय आकलन ने एक वजह बताई: झिल्ली के भीतर मौजूद अनगिनत छोटे हीरे के क्रिस्टलों के मिलन-बिंदुओं, यानी 'ग्रेन बाउंड्री' में असमानता। जैसे-जैसे झिल्ली और अधिक मुड़ती है, इन सीमाओं के आसपास विद्युत आवेश असमान रूप से जमा होता है, जिससे झिल्ली की दोनों सतहों के बीच विद्युत विभव का अंतर पैदा होता है।
हीरा जैव-अनुकूल और रासायनिक रूप से स्थिर होता है। यह गैर-विषैला भी है। इसलिए शोधकर्ताओं का कहना है कि पीज़ोइलेक्ट्रिक हीरे की झिल्लियों का इस्तेमाल भविष्य में शरीर के भीतर लगाए जाने वाले चिकित्सा उपकरणों में खुद बिजली बनाने वाले सेंसर या ऊर्जा स्रोत के रूप में किया जा सकता है। टिकाऊ, स्वयं-ऊर्जा उत्पन्न करने वाली अन्य सूक्ष्म ऊर्जा प्रणालियों में भी इनका इस्तेमाल संभव है।
शब्दों की व्याख्या
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