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ठीक होने के बाद भी क्यों लौटती है IBD? वैज्ञानिकों ने खोजा छिपा दोष

ऑस्ट्रेलिया के WEHI संस्थान के एक अध्ययन में पाया गया कि इनफ्लेमेटरी बाउल डिजीज़ (IBD) के हल्के होने पर भी आंत की कोशिकाएं मरने के लिए तैयार रहती हैं। यह संकेत जितना अधिक होगा, बीमारी लौटने का खतरा भी उतना ही ज़्यादा होगा।

चरण दर चरण

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    80 मरीज़ों से 900 ऊतक नमूने

  2. 2

    मरीज़ की कोशिकाओं से ऑर्गेनॉइड तैयार

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    ऊतक में कोशिका-मृत्यु संकेत मापा गया

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    ज़्यादा संकेत, दोबारा होने का ज़्यादा खतरा

क्रोहन रोग और अल्सरेटिव कोलाइटिस को शामिल करने वाली इनफ्लेमेटरी बाउल डिजीज़ (IBD, आंत की सूजन की बीमारी) पाचन तंत्र में लगातार सूजन पैदा करती है। पेट दर्द, दस्त, थकान और वज़न कम होना, बीच-बीच में अचानक बिगड़ने वाले दौरों के साथ आते हैं। ऑस्ट्रेलिया के वॉल्टर एंड एलिज़ा हॉल इंस्टीट्यूट (WEHI) ने रॉयल मेलबर्न अस्पताल के साथ मिलकर एक छिपा हुआ आणविक दोष खोजा है। यह बता सकता है कि मरीज़ ठीक दिखने पर भी ये दौरे क्यों लौटते हैं। यह खोज साइंस पत्रिका में प्रकाशित हुई।

टीम ने पाया कि बहुत कम या बिना लक्षण वाले मरीज़ों में भी आंत की कोशिकाएं मरने के लिए तैयार रहती हैं। दो साल से अधिक की निगरानी में, जिन मरीज़ों में यह कोशिका-मृत्यु संकेत ज़्यादा था, उनमें बीमारी लौटने की आशंका भी ज़्यादा पाई गई। सह-लेखक डॉ. आंद्रे सैमसन ने कहा कि इलाज से लक्षण पूरी तरह गायब होने के बाद भी दोबारा दौरा पड़ने की आशंका बनी रहती है। WEHI के उप निदेशक और लैब प्रमुख प्रोफेसर जेम्स मर्फी ने इसे एक 'सुलगता हुआ' दोष बताया, जो बीमारी के गंभीर लक्षण दिखने से बहुत पहले, शुरुआती चरण में ही उभर आता है।

IBD से ऑस्ट्रेलिया में करीब 180,000 लोग प्रभावित हैं। आधुनिक इलाज से कई मरीज़ ठीक हो जाते हैं, लेकिन इस बीमारी की पहचान और लगातार इलाज अब भी मुश्किल है। पहले के ज़्यादातर अध्ययन चूहों के मॉडल पर निर्भर थे। यह अध्ययन पूरी तरह इंसानी ऊतकों पर आधारित है। शोधकर्ताओं ने IBD वाले और बिना IBD वाले 80 लोगों से लगभग 900 ऊतक नमूने जुटाए। हर मरीज़ की अपनी कोशिकाओं से लैब में उगाए गए छोटे आंत जैसे ऊतक, यानी ऑर्गेनॉइड, इन नमूनों से बनाए गए। WEHI के कोलोनियल फाउंडेशन डायग्नोस्टिक्स सेंटर के प्रमुख प्रोफेसर एडविन हॉकिंस ने कहा कि इंसानी ऊतकों का उपयोग और मरीज़ों की बड़ी संख्या इस अध्ययन की बड़ी ताकत है। उन्होंने कहा कि चूहों के मॉडल अक्सर इंसानी स्थिति को सही ढंग से नहीं दर्शाते। नतीजे इस धारणा को चुनौती देते हैं कि आंत की कोशिकाओं की मृत्यु सिर्फ सूजन का नतीजा है, बल्कि यह बीमारी की प्रक्रिया का ही हिस्सा हो सकती है।

ये नतीजे अभी कोई नई जांच या इलाज उपलब्ध नहीं कराते। सह-लेखक और गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. आयशा अल-आनी ने कहा कि इसके बजाय ये भविष्य के शोध की नींव रखते हैं, जिसमें मरीज़ के पूर्वानुमान का बेहतर आकलन और नई संभावित चिकित्सा शामिल हैं।

शब्दों की व्याख्या

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