प्लास्टिक कचरे को ईंधन बनाने की नई तरकीब: पिघले नमक
ओक रिज नैशनल लैबोरेटरी (ORNL) ने पॉलीएथिलीन प्लास्टिक को 200°C से कम तापमान पर पेट्रोल और डीज़ल जैसे ईंधन में बदलने का तरीका खोजा है; इसमें धातु उत्प्रेरक या घोलक की ज़रूरत नहीं पड़ती।
चरण दर चरण
- 1
पॉलीएथिलीन कचरे को पिघले नमक में मिलाना
- 2
एल्युमिनियम स्थल कार्बन-हाइड्रोजन श्रृंखला तोड़ते हैं
- 3
छोटी श्रृंखलाओं से पेट्रोल जैसे यौगिक बनना
- 4
लंबी श्रृंखलाओं से डीज़ल जैसे उत्पाद बनना
- 5
न्यूट्रॉन स्कैटरिंग से प्रतिक्रिया की पुष्टि
पॉलीएथिलीन दुनिया में सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाले और रीसाइकल करने में सबसे मुश्किल प्लास्टिकों में से एक है। इसे गरम नमक के मिश्रण की मदद से पेट्रोल और डीज़ल जैसे ईंधन में बदलने का तरीका ओक रिज नैशनल लैबोरेटरी (ORNL) के शोधकर्ताओं ने खोजा है। प्रयोगशाला परीक्षणों में यह तरीका 200 डिग्री सेल्सियस (392 फ़ारेनहाइट) से भी कम तापमान पर काम कर गया — जो पारंपरिक तरीकों से कहीं ज़्यादा ठंडा है — और लगभग 60% पेट्रोल की उपज मिली।
आम औद्योगिक तरीका, पायरोलिसिस, लगभग 450 से 500 डिग्री सेल्सियस (842 से 932 फ़ारेनहाइट) की तेज़ गर्मी से प्लास्टिक को तोड़ता है। नया तरीका इसके बदले एल्युमिनियम क्लोराइड वाले पिघले नमक का इस्तेमाल करता है, जो प्रतिक्रिया का माध्यम और उत्प्रेरक दोनों का काम करता है। महंगे धात्विक उत्प्रेरक, कार्बनिक घोलक या बाहर से हाइड्रोजन देना — पारंपरिक तरीकों को जिन चीज़ों की ज़रूरत पड़ती है, इस नए तरीके को उनमें से किसी की ज़रूरत नहीं पड़ती। ORNL की वैज्ञानिक और सह-मुख्य लेखिका ज़ेनज़ेन यांग ने कहा, 'कचरे से उच्च-मूल्य वाले रसायन बनाने के लिए पिघले नमक को माध्यम के तौर पर इस्तेमाल करना यह पहली बार हुआ है। इसमें कोई उत्प्रेरक-आरंभक या घोलक नहीं लगा, और तापमान भी 200 डिग्री सेल्सियस से कम रहा।'
शोधकर्ताओं ने पाया कि पिघले नमक में मौजूद अम्लीय एल्युमिनियम स्थल, पॉलीएथिलीन की लंबी कार्बन-हाइड्रोजन श्रृंखलाओं को तोड़कर ईंधन में मिलने वाले छोटे हाइड्रोकार्बन अणुओं में बदल देते हैं। इस प्रतिक्रिया को समझने के लिए उन्होंने हाइड्रोजन के भारी रूप ड्यूटेरियम को एक रासायनिक निशान के तौर पर इस्तेमाल किया। ORNL के स्पैलेशन न्यूट्रॉन सोर्स में न्यूट्रॉन स्कैटरिंग तकनीक से इसका अध्ययन किया गया; यह तकनीक हाइड्रोजन और उसके आइसोटोप को पहचानने में खास तौर पर उपयोगी है। मापों से पता चला कि सरल पॉलीमर श्रृंखलाएं पेट्रोल जैसे यौगिक बनाती हैं, जबकि जटिल श्रृंखलाएं डीज़ल जैसे उत्पाद बनाती हैं।
लॉरेंस बर्कले नैशनल लैबोरेटरी के एडवांस्ड लाइट सोर्स में, टीम ने सॉफ्ट एक्स-रे किरणों का इस्तेमाल कर यह भी देखा कि प्रतिक्रिया के दौरान एल्युमिनियम उत्प्रेरक खुद कैसे बदलता है। इसे न्यूक्लियर मैग्नेटिक रेज़ोनेंस और एक्स-रे डिफ्रैक्शन से पुष्ट किया गया। गैस क्रोमैटोग्राफी-मास स्पेक्ट्रोमेट्री और कंप्यूटर सिमुलेशन का भी इस्तेमाल हुआ।
यह शोध ओक रिज लैबोरेटरी में दशकों से चल रहे पिघले नमक के अध्ययन पर आधारित है, जो 1960 के दशक में शुरू हुआ था, जब लैबोरेटरी के मोल्टन साल्ट रिएक्टर एक्सपेरिमेंट ने परमाणु रिएक्टरों के लिए इन्हीं पदार्थों की जांच की थी।
शब्दों की व्याख्या
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