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55 मिलियन वर्ष पुराने पेंगुइन जीवाश्म गर्म अंटार्कटिका के रासायनिक संकेत सुरक्षित रखते हैं

सीमोर द्वीप के इओसीन युग के पेंगुइन जीवाश्मों की स्कैनिंग करने वाले जीवाश्म वैज्ञानिकों को ऐसे रासायनिक संकेत मिले जो अंटार्कटिका की प्राचीन जलवायु के साथ बदलते हैं। यह बताता है कि जीवाश्म हड्डियां जलवायु इतिहास का एक नया स्रोत बन सकती हैं।

अंटार्कटिक प्रायद्वीप के पास स्थित सीमोर द्वीप की प्राचीन पेंगुइन हड्डियां केवल इन पक्षियों के अवशेष ही नहीं, बल्कि लाखों वर्षों में फैले पर्यावरणीय बदलावों को भी अपनी रासायनिक संरचना में सुरक्षित रखती हैं। यह बात चीन के चाइना यूनिवर्सिटी ऑफ जियोसाइंसेज (बीजिंग) के जीवाश्म वैज्ञानिकों ने बताई। सीमोर द्वीप में दुनिया के सबसे समृद्ध और सबसे निरंतर इओसीन युग के पेंगुइन जीवाश्म रिकॉर्ड में से एक मौजूद है। ये जीवाश्म अपेक्षाकृत गर्म और आर्द्र आरंभिक इओसीन से लेकर ठंडे मध्य और उत्तर इओसीन तक, अंटार्कटिका के जलवायु इतिहास के एक महत्वपूर्ण दौर को समेटे हुए हैं।

जीवाश्म दुर्लभ होने के कारण, हड्डियों को नुकसान पहुंचा सकने वाली विधियों के बजाय, शोधकर्ताओं ने माइक्रो-एक्स-रे फ्लोरेसेंस (माइक्रो-XRF) स्कैनिंग का इस्तेमाल किया। यह एक बिना नुकसान पहुंचाए काम करने वाली तकनीक है, जो किसी सतह पर मौजूद अलग-अलग रासायनिक तत्वों का नक्शा बनाती है। उन्हें अलग-अलग भूवैज्ञानिक कालखंडों की पेंगुइन हड्डियों में स्पष्ट अंतर मिला। लगभग 55 मिलियन वर्ष पुराने, आरंभिक इओसीन के जीवाश्मों में, ठंडे कालखंडों के छोटी उम्र वाले जीवाश्मों की तुलना में टाइटेनियम, सिलिकॉन और पोटैशियम के कहीं अधिक मज़बूत संकेत मिले।

पुराने जीवाश्मों में मिले टाइटेनियम, सिलिकॉन और पोटैशियम के उच्च स्तर की व्याख्या शोधकर्ताओं ने इस रूप में की कि यह गर्म, आर्द्र आरंभिक इओसीन के दौरान भूमि पर हुए तेज़ अपक्षय और अधिक भू-जल बहाव से मेल खाता है। जीवाश्म हड्डियों के अनियमित आकार और घुमावदार सतहों के कारण स्कैनिंग की स्थितियों को एक जैसा बनाए रखना मुश्किल था। इसलिए टीम ने हड्डियों को जितना संभव हो क्षैतिज रखा और स्कैनिंग हेड व हड्डी की सतह के बीच स्थिर दूरी बनाए रखी। इस तकनीक ने आयरन, मैंगनीज़ और सल्फर के उन पैटर्न को भी पकड़ा, जो हड्डियों के दबने के समय आसपास की समुद्री तलछट में हुए रासायनिक बदलावों को दर्शाते थे।

नतीजे बताते हैं कि जीवाश्म हड्डियों की रसायन शास्त्र, समुद्री तलछट की ड्रिलिंग और सूक्ष्मजीवाश्म विश्लेषण जैसे स्थापित जलवायु इतिहास स्रोतों की पूरक बन सकती है। इससे शोधकर्ताओं को मौजूदा जीवाश्म संग्रहों का उपयोग करके अंटार्कटिका के दूर के अतीत को फिर से समझने का एक और तरीका मिलता है। बोयांग शिया, हुआईचुन वू और क्वानगुओ ली द्वारा किया गया यह अध्ययन 31 जुलाई को पत्रिका फॉसिल रिकॉर्ड में प्रकाशित हुआ।

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