बार-बार आईलैश एक्सटेंशन कराने से त्वचा में माइट्स और आंखों में जलन का खतरा: अध्ययन
यूरोपीय नेत्र सर्जरी सम्मेलन में पेश किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि नियमित रूप से आईलैश एक्सटेंशन कराने वाली ज़्यादातर युवतियों में माइट्स और पलक ग्रंथि की समस्याएं पाई गईं।
नियमित रूप से आईलैश एक्सटेंशन कराने वाली युवतियों पर एक अध्ययन हुआ है। इसमें पाया गया कि उनमें से ज़्यादातर की पलकों पर डेमोडेक्स फॉलिकुलोरम नाम के सूक्ष्म माइट्स मौजूद हैं, जो डेमोडिकोसिस नाम की दर्दनाक त्वचा प्रतिक्रिया पैदा कर सकते हैं। यह शोध यूक्रेन के विन्नित्सिया स्थित नेशनल पिरोगोव मेमोरियल मेडिकल यूनिवर्सिटी की डॉक्टर तेत्याना ज़्मुद ने पेश किया। इसे यूरोपियन सोसाइटी ऑफ कैटरैक्ट एंड रिफ्रैक्टिव सर्जन्स (ESCRS) की 44वीं कांग्रेस में रखा गया। इसमें यह भी पाया गया कि कई महिलाओं को आंखों में जलन और मेइबोमियन ग्रंथियों की समस्या थी -- ये पलकों के पास मौजूद छोटी ग्रंथियां हैं जो आंखों को सूखने से बचाने के लिए तेल बनाती हैं।
ज़्मुद की टीम ने 16 से 28 साल की 345 महिलाओं का सर्वे किया, जिनमें से करीब एक-चौथाई ने कभी न कभी आईलैश एक्सटेंशन कराया था। इनमें से 58% हर तीन से चार हफ्ते में इसे कराती थीं, और 47.6% ने बताया कि इसके बाद उन्हें असुविधा, लालिमा, आंसू आना या खुजली महसूस हुई। मेइबोग्राफी नाम की तकनीक पलकों के आर-पार ग्रंथियों को देखने के लिए इन्फ्रारेड लाइट का इस्तेमाल करती है। इससे पता चला कि जिन महिलाओं ने कम से कम 10 बार एक्सटेंशन कराया था, उनमें से 85% में मेइबोमियन ग्रंथि की खराबी के संकेत मिले, यानी ग्रंथियां या तो बंद थीं या ठीक से तेल नहीं बना रही थीं।
नियमित रूप से एक्सटेंशन इस्तेमाल करने वाली 25 महिलाओं की पलकों के नमूनों की माइक्रोस्कोप से जांच में शोधकर्ताओं ने एक को छोड़कर सभी में डेमोडेक्स फॉलिकुलोरम माइट्स पाए। इनमें से 18 में माइट्स की वजह से आमतौर पर होने वाली खुजली, लालिमा, सूजन और पलकों के आधार पर परतदार त्वचा जैसी जलन के लक्षण दिखे। ज़्मुद ने कहा कि इन निष्कर्षों का मतलब यह नहीं है कि लोग आईलैश एक्सटेंशन से पूरी तरह बचें, लेकिन इनसे पलकों की स्वच्छता और लक्षण दिखने पर तुरंत जांच का महत्व पता चलता है। उन्होंने यह भी बताया कि यह अध्ययन छोटा था और इसमें एक्सटेंशन न कराने वाली महिलाओं से तुलना नहीं की गई।
बेल्जियम के यूज़ेड ब्रसेल अस्पताल की प्रोफेसर सोर्चा नी डुभगेल इस शोध में शामिल नहीं थीं। उन्होंने कहा कि ये माइट्स आम हैं, लेकिन युवतियों में आमतौर पर बड़ी संख्या में नहीं दिखते। आमतौर पर इनका पता पलकों के आधार पर मौजूद मरे हुए माइट्स, मल और अंडों से बने मोम जैसे 'कॉलरेट' के ज़रिए चलता है, उन्होंने बताया। उन्होंने कहा कि आईलैश एक्सटेंशन में इस्तेमाल होने वाला गोंद उसी जगह के पास लगाया जाता है, जिससे कॉलरेट को पहचानना मुश्किल हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि डेमोडेक्स फॉलिकुलोरम का मौजूद होना हमेशा बीमारी का संकेत नहीं है, क्योंकि ये माइट्स आंख के सामान्य माइक्रोबायोटा का हिस्सा भी हो सकते हैं।
शब्दों की व्याख्या
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