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तूफान के नक्शे बेहतर हुए, पर एक बड़ी समस्या अब भी बाकी

फ्लोरिडा स्टेट यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन में पाया गया कि नया प्रायोगिक तूफान पूर्वानुमान ग्राफिक लोगों को अंतर्देशीय वॉच सूचना वाले इलाके पहचानने में मदद करता है। लेकिन इससे उनके खतरे की समझ या बचाव योजना में कोई बदलाव नहीं आया।

फ्लोरिडा स्टेट यूनिवर्सिटी (FSU) के शोधकर्ताओं ने राष्ट्रीय तूफान केंद्र (NHC) के एक प्रायोगिक तूफान पूर्वानुमान ग्राफिक का परीक्षण किया। यह ग्राफिक तट पर केंद्रित रहे परिचित पथ-पूर्वानुमान ‘अनिश्चितता शंकु’ में अंतर्देशीय यानी तट से दूर के इलाकों के लिए तूफान की वॉच सूचनाएं और चेतावनियां भी जोड़ता है। बाढ़, बवंडर और नुकसानदेह हवाओं जैसे अंतर्देशीय खतरों को और स्पष्ट दिखाने के लिए NHC ने 2024 में यह नया ग्राफिक पेश किया था। यह निष्कर्ष अमेरिकी मौसम विज्ञान सोसाइटी की पत्रिका वेदर, क्लाइमेट एंड सोसाइटी में प्रकाशित हुए।

FSU के स्कूल ऑफ कम्युनिकेशन और भूगोल विभाग के प्रोफेसरों ने फ्लोरिडा और जॉर्जिया के प्रतिभागियों को पारंपरिक तटीय शंकु या अंतर्देशीय जानकारी वाला नया ग्राफिक दिखाया। पारंपरिक शंकु वही था जो सितंबर 2022 में तट से टकराने वाले तूफान इयान के लिए इस्तेमाल हुआ था। मुख्य लेखिका और FSU की सहायक प्रोफेसर एलिज़ाबेथ रे ने कहा कि राष्ट्रीय तूफान केंद्र ने तूफान की जानकारी बेहतर तरीके से बताने के लिए सोच-समझकर बदलाव किए हैं। शोधकर्ता यह जानना चाहते थे कि क्या इन बदलावों ने वाकई लोगों को ग्राफिक से दिखने वाला खतरा समझने में मदद की।

पारंपरिक शंकु देखने वालों की तुलना में, नया ग्राफिक देखने वाले लोग अंतर्देशीय वॉच सूचना वाले इलाकों को पहचानने में ज़्यादा सफल रहे। लेकिन इस बेहतर समझ से न तो उन्हें ज्यादा खतरा महसूस हुआ, न ही उन्होंने बचाव के उपाय अपनाने की ज़्यादा योजना बनाई। इससे चेतावनी वाले इलाकों को पहचानने की उनकी क्षमता भी नहीं बढ़ी। शोधकर्ताओं के मुताबिक इसकी एक बड़ी वजह ‘अनिश्चितता शंकु’ के अर्थ को लेकर बना पुराना भ्रम है। वर्षों के शोध से पता चला है कि लोग अक्सर चौड़े शंकु को बड़ा तूफान समझ बैठते हैं। रे ने कहा कि अपडेट किए गए ग्राफिक के साथ भी यह गलतफहमी दूर करना मुश्किल बना रहता है।

शोधकर्ताओं ने कहा कि उनके नतीजे NHC के पूर्वानुमान की गुणवत्ता पर सवाल नहीं उठाते, जिसे वे बेहद सटीक बताते हैं। सह-लेखक पैट्रिक मर्ल के मुताबिक असली चुनौती यह है कि विज्ञान को इस तरह बताया जाए कि मौसम विज्ञानी न होने वाले लोग भी अपने खतरे को समझ सकें। FSU के स्कूल ऑफ कम्युनिकेशन के निदेशक और प्रोफेसर मर्ल ने कहा कि अगर लोग जानकारी को भरोसेमंद तो मानते हैं पर उसे समझ नहीं पाते, तो इसका मतलब है कि जानकारी ठीक से नहीं पहुंचाई गई। शोधकर्ताओं की सलाह है कि तूफान ग्राफिक पर अकेले निर्भर न रहकर, उसे किसी इलाके में अपेक्षित असर बताने वाले स्थानीय पूर्वानुमान के साथ जोड़कर देखा जाए।

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