आईआईटी मद्रास ने बनाई पक्षी-प्रेरित 'मॉर्फिंग स्किन', रोकेगी विमान स्टॉल
पक्षियों की उड़ान से प्रेरित होकर आईआईटी मद्रास के शोधकर्ताओं ने एक लचीली 'मॉर्फिंग स्किन' विकसित की है, जो एयरोडायनामिक स्टॉल को रोककर विमानों को सुरक्षित और ईंधन-कुशल बनाती है।
चरण दर चरण
- 1
पंख से हवा का प्रवाह अलग होने लगता है
- 2
MFC पट्टियां बदलाव को महसूस करती हैं
- 3
त्वचा आकार बदलकर प्रवाह जोड़े रखती है
- 4
लिफ्ट बनी रहती है, स्टॉल रुकता है
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास (आईआईटी मद्रास) के शोधकर्ताओं ने पक्षियों की उड़ान से प्रेरित होकर विमान के पंखों के लिए एक 'मॉर्फिंग स्किन' (आकार बदलने वाली त्वचा) विकसित की है। यह एयरोडायनामिक स्टॉल — यानी पंख से हवा का प्रवाह अलग होने पर लिफ्ट के अचानक कम हो जाने की स्थिति — को रोकने के लिए बनाई गई है। आईआईटी मद्रास के एप्लाइड मैकेनिक्स एवं बायोमेडिकल इंजीनियरिंग विभाग की डॉ. रिंकु मुखर्जी के नेतृत्व में हुआ यह शोध पीयर-रिव्यूड एल्सेवियर जर्नल यूरोपियन जर्नल ऑफ मैकेनिक्स – बी/फ्लुइड्स में प्रकाशित हुआ है।
यह प्रणाली पंख पर एक नरम अतिरिक्त त्वचा जोड़ती है, जो हवा के प्रवाह के अलग होने की शुरुआत होते ही तुरंत अपना आकार बदल लेती है और तेज़ झुकाव कोण पर भी हवा के प्रवाह को पंख से जुड़ा रखती है। इससे लिफ्ट बनी रहती है और ड्रैग (वायु प्रतिरोध) कम होता है, बजाय इसके कि अचानक स्टॉल हो जाए। टीम ने इस त्वचा को मैक्रो फाइबर कम्पोजिट (MFC) पट्टियों से बनाया है, जो हवा के प्रवाह में बदलाव को महसूस कर सतह का आकार बदल देती हैं।
आईआईटी मद्रास के पूर्व छात्र एंटनी सैमुअल बी ने संख्यात्मक मॉडलिंग पर काम किया, जबकि इसी संस्थान के पूर्व छात्र डॉ. अरित्रास रॉय ने विंड टनल प्रयोग किए और मुखर्जी के साथ इस शोधपत्र के सह-लेखक रहे। इस मॉर्फिंग स्किन का परीक्षण NACA 4415 नामक मानक एयरोफॉयल वाले त्रि-आयामी पंख पर किया गया और इसे कंप्यूटर मॉडल तथा विंड टनल प्रयोगों दोनों से सत्यापित किया गया। शोधकर्ताओं के अनुसार यह सामान्य परिचालन सीमाओं से आगे भी काम करता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि यह तकनीक व्यस्त या छोटे रनवे पर यात्री विमानों की सुरक्षित टेक-ऑफ और लैंडिंग में मदद कर सकती है, जबकि अधिक लिफ्ट और कम ड्रैग से ईंधन खपत और उत्सर्जन भी घट सकता है। यह मानवरहित हवाई वाहनों (UAV) और ड्रोन की सहनशक्ति और गतिशीलता भी बढ़ा सकती है, और अशांत मौसम जैसी विपरीत परिस्थितियों में पायलटों को अधिक नियंत्रण दे सकती है।
मुखर्जी ने बताया कि यह शोध 20 साल से भी पुराना है और अलग हुए वायु प्रवाह के अध्ययन से शुरू हुआ था, जिसे टीम ने अब एक वास्तविक उपकरण में बदल दिया है, प्रयोगात्मक रूप से सत्यापित किया है और इसका पेटेंट भी करा लिया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह प्रणाली अब असली विमानों में वास्तविक उड़ान स्थितियों में लागू करने के लिए तैयार है।
शब्दों की व्याख्या
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