पाठ्यपुस्तकें लगभग 100 वर्षों से इंडक्टिव इफेक्ट को गलत बता रही थीं: अध्ययन
एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में पाया गया है कि कार्बनिक रसायन की पाठ्यपुस्तकें लगभग 100 वर्षों से ‘इंडक्टिव इफेक्ट’ को गलत तरीके से समझा रही थीं, और यह प्रभाव उदासीन अणु में एक ही बंध तक सीमित रहता है।
एक अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ता दल का कहना है कि पीढ़ियों से छात्रों को पढ़ाई जाने वाली रसायन विज्ञान की एक अवधारणा को पाठ्यपुस्तकों ने लगभग 100 वर्षों से गलत तरीके से समझाया है। अणुओं के भीतर परमाणु इलेक्ट्रॉनों के वितरण को कैसे प्रभावित करते हैं, यह बताने वाली बुनियादी अवधारणा है ‘इंडक्टिव इफेक्ट’। इस पर 2024 के उनके शोध में पाया गया कि पारंपरिक पाठ्यपुस्तक व्याख्या आधुनिक साक्ष्यों से मेल नहीं खाती। इन्हीं निष्कर्षों को आगे बढ़ाने वाला एक नया शोधपत्र ‘जर्नल ऑफ केमिकल एजुकेशन’ में प्रकाशित हुआ है।
ब्रिटेन के कार्डिफ विश्वविद्यालय और ऑस्ट्रेलिया के न्यूकैसल विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के नेतृत्व में इस टीम का कहना है कि इंडक्टिव इफेक्ट पाठ्यपुस्तकों में बताई गई सीमा से कहीं कम दूरी तक ही काम करता है। दशकों से पाठ्यपुस्तकों में पढ़ाया जाता रहा है कि कुछ परमाणुओं का प्रभाव अणु के भीतर तीन या चार बंधों तक फैलता है और दूरी बढ़ने के साथ धीरे-धीरे कमज़ोर होता जाता है। लेकिन नए शोध के अनुसार, एक उदासीन अणु में यह प्रभाव एक ही बंध से आगे नहीं जाता। कार्डिफ विश्वविद्यालय के रसायन विज्ञान स्कूल से जुड़े अध्ययन के प्रमुख लेखक डॉ. मार्क इलियट ने कहा, “हमें कुछ प्रकार की अभिक्रियाशीलता की व्याख्याओं को नए सिरे से गढ़ना होगा।”
यह खोज इसलिए मायने रखती है क्योंकि कार्बनिक रसायनज्ञ दवाओं, उन्नत सामग्रियों, कृषि-रसायनों और पॉलिमर का आधार बनाने वाली परमाणु श्रृंखलाओं की संरचना और अभिक्रियाशीलता समझाने के लिए इंडक्टिव इफेक्ट पर निर्भर रहते हैं। इलियट के अनुसार, ब्रिटेन की स्कूली अंतिम स्तर की परीक्षा जीसीएसई (GCSE) के बाद रसायन विज्ञान पढ़ने वाला हर व्यक्ति इस अवधारणा को सीखता है। असर यह हुआ कि दो ए-लेवल परीक्षा बोर्डों ने इसी शोध का हवाला देते हुए इंडक्टिव इफेक्ट पढ़ाने के अपने तरीके की समीक्षा करने की घोषणा कर दी है।
यह निष्कर्ष किसी एक प्रयोग से नहीं निकला। टीम ने वैज्ञानिक साहित्य में पहले से बिखरे साक्ष्यों को अपने खुद के सुसंगत आंकड़ों के साथ जोड़कर यह निष्कर्ष निकाला। यह अंतरराष्ट्रीय सहयोग तब बढ़ा जब इलियट को न्यूकैसल विश्वविद्यालय के डॉ. एडविन जॉनसन और न्यू इंग्लैंड विश्वविद्यालय के डॉ. कासिमिर ग्रेगरी के शोध के बारे में पता चला। इलेक्ट्रोनेगेटिव तत्व (जो इलेक्ट्रॉनों को अपनी ओर खींचते हैं) अम्लता को कैसे प्रभावित करते हैं, इस पर उनके शोध के नतीजे भी पारंपरिक पाठ्यपुस्तक व्याख्याओं से मेल नहीं खाते थे।
शोधकर्ताओं ने बताया कि पहले की पीढ़ी के रसायनज्ञों को सीमित प्रायोगिक आंकड़ों से अप्रत्यक्ष निष्कर्ष निकालने पड़ते थे। आज आधुनिक कम्प्यूटेशनल तरीके वैज्ञानिकों को अणु संरचनाओं और इलेक्ट्रॉन वितरण का सीधे अध्ययन करने देते हैं।
शब्दों की व्याख्या
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