इंसान अब कम बोलने लगे हैं? एरिज़ोना विश्वविद्यालय के शोध में चौंकाने वाला खुलासा
2005 से 2019 के बीच के 15 सालों में, इंसानों के रोज़ाना बोले जाने वाले औसत शब्दों की संख्या में 28% की गिरावट आई है, एरिज़ोना विश्वविद्यालय के मनोवैज्ञानिकों के शोध में यह पाया गया.
इंसान अपने रोज़मर्रा के जीवन में एक-दूसरे से जितने शब्द बोलते हैं, उसकी संख्या पिछले सालों की तुलना में काफी कम हो गई है. एरिज़ोना विश्वविद्यालय के मनोवैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक विस्तृत शोध में यह बात सामने आई है. 2005 से 2019 के बीच के 15 सालों में, एक इंसान के रोज़ाना बोले जाने वाले औसत शब्दों की संख्या में 28% की गिरावट दर्ज हुई है. यानी, हर साल इंसानों के बोले जाने वाले शब्दों की मात्रा औसतन करीब 338 शब्दों तक कम होती जा रही है.
बातचीत कम होने के लिए मोबाइल फोन और सोशल मीडिया को अक्सर ज़िम्मेदार माना जाता है, लेकिन रोज़मर्रा की बातचीत के स्वचालित हो जाने को ही इसका सबसे बड़ा कारण माना गया है. दुकानों में बिल चुकाने वाली सेल्फ-चेकआउट मशीनें, ऑनलाइन खाना ऑर्डर करने वाले ऐप और रास्ता बताने वाला जीपीएस जैसी तकनीकों ने लोगों की रोज़मर्रा की बातचीत को काफी हद तक खत्म कर दिया है. इसी वजह से दुकानों और सड़कों पर अजनबियों से होने वाली छोटी-मोटी बातचीत अब लगभग गायब हो गई है.
यह सच तब सामने आया जब शोधकर्ताओं ने पुरुष और महिलाएँ रोज़ाना कितने शब्द बोलते हैं, इस पुराने अध्ययन की फिर से जाँच की. 2007 के एक अध्ययन के मुताबिक, एक व्यक्ति औसतन रोज़ाना 15,900 शब्द बोलता था. लेकिन 2019 के नए आँकड़ों के मुताबिक, यह संख्या घटकर 12,700 रह गई है. करीब 2,200 लोगों पर हुए 22 अलग-अलग अध्ययनों के आँकड़ों की तुलना करने के बाद ही शोधकर्ताओं ने इस सटीक निष्कर्ष की पुष्टि की.
फोन पर टाइप करके भेजे गए संदेश आमने-सामने की बातचीत की जगह कभी नहीं ले सकते, ऐसी चेतावनी मनोवैज्ञानिक देते हैं. आमने-सामने बात करते समय ही सामने आने वाली भावनाएँ, हँसी, आवाज़ का उतार-चढ़ाव और इंसानी जुड़ाव, संदेशों में नहीं मिलते. रोज़मर्रा की ज़िंदगी में आमने-सामने की बातचीत कम होने के कारण, दुनिया भर में अकेलापन और तनाव जैसी सामाजिक समस्याएँ तेज़ी से बढ़ रही हैं.
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