मस्तिष्क वर्गीकरण: सिर्फ इंद्रियां नहीं, शरीर की ऊर्जा-जरूरतें भी वजह
नॉर्थईस्टर्न यूनिवर्सिटी की लीसा फेल्डमैन बैरेट और एमआईटी के अर्ल मिलर द्वारा लिखे इस नए ढांचे के मुताबिक, मस्तिष्क सिर्फ इंद्रियों से नहीं बल्कि शरीर की ऊर्जा जरूरतों के आधार पर भी श्रेणियां बनाता है। इसमें यह भी कहा गया है कि वर्गीकरण मस्तिष्क के किसी एक…
चरण दर चरण
- 1
संवेदी संकेत मस्तिष्क तक पहुंचते हैं
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मस्तिष्क फीडबैक संकेत बनाता है
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टकराव से भविष्यवाणी की चूक बनती है
- 4
शरीर की जरूरतें श्रेणी तय करती हैं
- 5
श्रेणी सचेत अनुभव बन जाती है
हर पल हमारा मस्तिष्क संवेदी संकेतों से भर जाता है — आंखों पर पड़ता प्रकाश, कानों से टकराती ध्वनि तरंगें, गंध, स्वाद और स्पर्श। मस्तिष्क इन सबको वर्गीकरण (categorization) नामक प्रक्रिया के जरिए वस्तुओं, लोगों, विचारों और भावनाओं में समेट देता है। पारंपरिक न्यूरोसाइंस के मुताबिक यह संवेदी प्रसंस्करण का आखिरी चरण है। मस्तिष्क चुपचाप जानकारी लेता है और उसे याददाश्त में जमा टेम्पलेट्स से मिलाता है, जैसे कोई क्लर्क फाइल अलमारी में खोजता हो। लेकिन यह मॉडल रोजमर्रा की लचीलापन नहीं समझा पाता। दिन में खुली सड़क पर सुनाई देने वाली लयबद्ध आहट कबूतर के उड़ने जैसी लगती है, जबकि वही आवाज रात में सुनसान गली में किसी अजनबी के कदमों जैसी सुनाई देती है।
नेचर रिव्यूज न्यूरोसाइंस पत्रिका में एक नया ढांचा प्रकाशित हुआ है। इसे नॉर्थईस्टर्न यूनिवर्सिटी की न्यूरोसाइंटिस्ट लीसा फेल्डमैन बैरेट और मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) के अर्ल मिलर ने मिलकर लिखा है। उनके मुताबिक मस्तिष्क हर पल अपनी श्रेणियों को नए सिरे से बनाता है। यह सिर्फ इंद्रियों और याददाश्त से नहीं, बल्कि शरीर की तात्कालिक शारीरिक और ऊर्जा जरूरतों के आधार पर भी होता है। उनके मुताबिक ये श्रेणियां वस्तुनिष्ठ सच्चाई को नहीं दर्शातीं। बल्कि मस्तिष्क शरीर की जीवित रहने की जरूरतों को पूरा करने के लिए दुनिया पर श्रेणियां थोप देता है। जमा हुई संवेदी जानकारी नहीं, बल्कि मस्तिष्क की भविष्यवाणियां ही तय करती हैं कि हम क्या महसूस करते हैं। यह ढांचा यह भी कहता है कि वर्गीकरण मस्तिष्क के किसी एक हिस्से तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे तंत्रिका तंत्र में फैला होता है।
यह ढांचा दोनों वैज्ञानिकों के पुराने शोध को जोड़ता है। मिलर प्रेडिक्टिव कोडिंग नाम के मॉडल पर काम करते हैं। इसके मुताबिक मस्तिष्क लगातार ऐसे फीडबैक संकेत बनाता है जो बताते हैं कि आगे क्या होगा। ये आम तौर पर बाहर से आने वाले फीडफॉरवर्ड संवेदी संकेतों पर हावी रहते हैं। जब दोनों में टकराव होता है, तो एक 'प्रेडिक्शन एरर' यानी भविष्यवाणी की चूक बनती है। इसे कभी-कभी आश्चर्य के रूप में महसूस किया जाता है। बैरेट एलोस्टेसिस (allostasis) पर शोध करती हैं, यानी शरीर पहले से अंदाजा लगाकर अपनी ऊर्जा के इस्तेमाल को कैसे नियंत्रित करता है। उनके मुताबिक डर जैसी भावनाएं भविष्यवाणी वाली 'कार्ययोजनाएं' हैं। तेज़ दिल की धड़कन, तेज़ सांस और तनी हुई मांसपेशियां — अगर कोई कुत्ता पीछे दौड़ रहा हो तो — इन्हें 'डर' के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। यह लड़ो-या-भागो (fight-or-flight) प्रतिक्रिया शुरू कर देती है, न कि यह जन्म से तय किसी सर्किट में पहले से तय होता है।
बैरेट ने 2025 में सबसे पहले मिलर से संपर्क किया। उन्होंने अपने विचारों को मिलाकर साझा पेपर लिखने का प्रस्ताव रखा। इस शोध से जुड़े न होने वाले मैरीलैंड यूनिवर्सिटी के न्यूरोसाइंटिस्ट लुइज़ पेसोआ ने इस ढांचे को 'वर्गीकरण पर एक नया नजरिया' बताया। श्रेणियों की बुनियाद के तौर पर शरीर की ऊर्जा-सीमाओं को बनाए रखने के विचार को आगे बढ़ाना 'बेहद जरूरी' है, ऐसा उन्होंने कहा।
शब्दों की व्याख्या
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