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धान-गेहूं की जगह मक्का, मोटे अनाज? आईआईटी गांधीनगर के अध्ययन का सुझाव

आईआईटी गांधीनगर और जर्मनी के UFZ के शोधकर्ताओं का कहना है कि धान-गेहूं की कुछ ज़मीन को मक्का और मोटे अनाजों में बदलने से भूजल दोहन, नाइट्रोजन अधिशेष और उत्सर्जन घटाया जा सकता है। यह बदलाव कैलोरी उत्पादन व आमदनी बनाए रखते हुए, 664 ज़िलों के आंकड़ों के आधार पर…

चरण दर चरण

  1. 1

    664 ज़िलों के फसल पैटर्न का विश्लेषण

  2. 2

    आमदनी, कैलोरी सीमाओं के साथ मॉडल तैयार

  3. 3

    मॉडल ने धान-गेहूं से बदलाव का सुझाव दिया

  4. 4

    धान 8.8%, गेहूं 12.1% घटे

  5. 5

    मोटे अनाजों की हिस्सेदारी लगभग एक-तिहाई तक

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान गांधीनगर और जर्मनी के हेल्महोल्ट्ज़ पर्यावरण अनुसंधान केंद्र (UFZ) के शोधकर्ताओं ने एक नया अध्ययन किया है। इसके मुताबिक, भारत के कुछ हिस्सों में धान और गेहूं की ज़मीन का एक हिस्सा मक्का और पारंपरिक मोटे अनाजों की ओर मोड़ा जाए, तो भूजल दोहन, नाइट्रोजन अधिशेष और कृषि उत्सर्जन घटाया जा सकता है। साथ ही, कैलोरी उत्पादन और अनाज क्षेत्र की आमदनी पहले जैसी बनी रह सकती है। यह अध्ययन नेचर कम्युनिकेशन्स पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। यह भारत के 664 ज़िलों में फसल पैटर्न के विश्लेषण पर आधारित है।

आईआईटी गांधीनगर के प्रोफेसर उदित भाटिया, डॉ. शेखर शरण गोयल और UFZ की डॉ. रोहिणी कुमार ने इस शोध टीम का नेतृत्व किया। टीम ने एक ऑप्टिमाइज़ेशन मॉडल तैयार किया, यानी तय शर्तों के तहत सबसे बेहतर भूमि-आवंटन पैटर्न खोजने की एक गणितीय विधि। मॉडल की एक शर्त यह थी कि किसी भी राज्य का कैलोरी उत्पादन 2017 के स्तर से नीचे न जाए। दूसरी शर्त यह थी कि अनाज क्षेत्र का कुल शुद्ध लाभ बना रहे। तीसरी शर्त यह थी कि मक्का या मोटे अनाजों का विस्तार केवल उन्हीं इलाकों में हो जहां पहले से इनकी खेती का इतिहास रहा हो।

इस प्रस्तावित परिदृश्य के तहत, धान का रकबा 8.8 प्रतिशत और गेहूं का रकबा 12.1 प्रतिशत तक घट सकता है। इससे खाली हुई ज़मीन मुख्य रूप से मक्का और ज्वार, बाजरा, रागी जैसे पारंपरिक मोटे अनाजों की ओर मोड़ी जाएगी। इससे भारत की कुल अनाज-भूमि में मोटे अनाजों की हिस्सेदारी मौजूदा लगभग एक-चौथाई से बढ़कर लगभग एक-तिहाई हो सकती है। शोधकर्ताओं के अनुसार यह धान या गेहूं को पूरी तरह हटाने की सिफारिश नहीं है। बल्कि, जिन जगहों पर इनकी पर्यावरणीय और आर्थिक लागत ज़्यादा है, वहां इनकी सघनता घटाने की बात है।

मॉडल में नाइट्रोजन अधिशेष, यानी फसल द्वारा अवशोषित न किया गया और बचा रह जाने वाला उर्वरक, को व्यवस्था की स्थिरता सुधारने वाले सबसे अहम कारकों में से एक पाया गया। शोध में यह भी सामने आया कि इसे घटाने से जल संबंधी लाभ भी मिलते हैं। इसकी वजह यह है कि भूजल संकट, उर्वरक इस्तेमाल और फसल सघनता अक्सर एक ही इलाकों में एक साथ पाए जाते हैं। धान की खेती मीथेन उत्सर्जन और भारी जल उपयोग से जुड़ी है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि मक्का और मोटे अनाजों के लिए भरोसेमंद खरीदार, भंडारण सुविधाएं, प्रसंस्करण क्षमता और सक्रिय मूल्य शृंखलाएं किसानों को उपलब्ध होनी चाहिए। इस बदलाव को असल में लागू करने के लिए यह ज़रूरी है, ऐसा शोधकर्ताओं ने बताया।

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