पंजाब में काले कार्बन प्रदूषण का करीब आधा हिस्सा पराली जलाने से: अध्ययन
पंजाब में वास्तविक समय वायु प्रदूषण मापने वाले IIT दिल्ली के अध्ययन में पाया गया कि फ़सल-अवशेष जलाना मानसून के बाद के मौसम में औसतन 48% काला कार्बन पैदा करता है, और सक्रिय जलाने के समय यह 90% से भी ऊपर चला जाता है।
चरण दर चरण
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खेराल गांव में मोबाइल लैब लगाई गई
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अक्टूबर-नवंबर में काला कार्बन मापा गया
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दो स्रोत मॉडलों से नतीजे मिलाए गए
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पराली जलाना मुख्य स्रोत मिला
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HYSPLIT से प्रदूषक फैलाव ट्रैक हुआ
फ़सल-अवशेष जलाना, जिसे पराली जलाना भी कहते हैं, काले कार्बन प्रदूषण में कितना योगदान देता है, इसे IIT दिल्ली के शोधकर्ताओं के एक नए अध्ययन ने मापा है। यह प्रदूषण उत्तर भारत के इंडो-गैंगेटिक मैदान में, दिल्ली जैसे हवा की दिशा में पड़ने वाले शहरों सहित, फैलता है। 2015 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण के आदेश के बावजूद, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान जैसे राज्यों में यह प्रथा अब भी जारी है।
पंजाब के ग्रामीण खेराल गांव के एक खेत स्थल पर, काला कार्बन मापने वाले उपकरण एथेलोमीटर से लैस एक मोबाइल निगरानी लैब का शोधकर्ताओं ने उपयोग किया। उन्होंने पाया कि फ़सल-अवशेष जलाना मानसून के बाद के मौसम में औसतन 48% काले कार्बन के लिए ज़िम्मेदार था। सक्रिय जलाने के समय यह हिस्सा 90% से भी ऊपर चला जाता था। धान की कटाई के बाद फ़सल-अवशेष जलाने के चरम मौसम, अक्टूबर और नवंबर में यह अध्ययन किया गया। उस स्थल पर औसत काला कार्बन सांद्रता 12.6 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज हुई, जो पहले दिल्ली (17.23) और आगरा (करीब 13) में दर्ज स्तरों से थोड़ी कम थी।
दो विश्लेषण मॉडलों ने मिलते-जुलते नतीजे दिए। एथेलोमीटर मॉडल ने पाया कि जैव-ईंधन जलाने और जीवाश्म ईंधन जलाने का योगदान क्रमशः 48.5% और 51.5% था। अधिक विस्तृत 'पॉज़िटिव मैट्रिक्स फैक्टराइज़ेशन' मॉडल ने जैव-ईंधन जलाने को सबसे बड़ा अकेला स्रोत (48%) बताया, इसके बाद बिजली संयंत्र उत्सर्जन (24%) और यातायात उत्सर्जन (20.2%) का स्थान रहा। एक औद्योगिक स्रोत और कचरा जलाने से छोटा योगदान मिला। NOAA के HYSPLIT मॉडल का उपयोग कर शोधकर्ताओं ने यह भी पुष्टि की कि पंजाब स्थल से प्रदूषक तत्व यात्रा कर इंडो-गैंगेटिक मैदान के हवा की दिशा में पड़ने वाले इलाकों को प्रभावित करते हैं।
इस अध्ययन से न जुड़ीं लिल विश्वविद्यालय की पोस्टडॉक्टरल शोधकर्ता प्रतिमा गुप्ता ने कहा कि ये निष्कर्ष मज़बूत सबूत देते हैं कि पराली जलाना अस्थायी रूप से स्थानीय काले कार्बन प्रदूषण का प्रमुख स्रोत बन सकता है। लेकिन उन्होंने यह भी बताया कि दूसरी जगहों के अन्य अध्ययनों में कम योगदान मिला है। 2024 के एक अध्ययन ने अनुमान लगाया कि दिल्ली में अलग-अलग महीनों में पराली जलाने का योगदान 15% से 37% के बीच रहा। वहीं व्यापक इंडो-गैंगेटिक मैदान के 2025 के एक अध्ययन में घरेलू जैव-ईंधन जलाना सबसे बड़ा स्रोत (58%) पाया गया, और मानसून के बाद के मौसम में पराली जलाने का हिस्सा सिर्फ़ 3.5% था।
शब्दों की व्याख्या
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