लखनऊ के स्वतंत्र खगोल शोधकर्ताओं ने खोजी दुर्लभ 'बबलगम' नेबुला
लखनऊ के दो स्वतंत्र युवा शोधकर्ताओं ने मोनोसेरोस तारामंडल में एक अब तक अज्ञात नेबुला खोजी है, जिसे 'बबलगम' नाम दिया गया है और अब नासा के वरिष्ठ वैज्ञानिक भी इसका अध्ययन कर रहे हैं।
चरण दर चरण
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2021: नैरोबैंड तस्वीरों का अध्ययन
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असामान्य चमक और बनावट का पता चला
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कई साल का विस्तृत अध्ययन
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खोज की पुष्टि और प्रकाशन
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नासा वैज्ञानिकों का अध्ययन शुरू
लखनऊ के दो स्वतंत्र युवा खगोल शोधकर्ताओं, उत्कर्ष मिश्रा और संकल्प मोहन ने मोनोसेरोस तारामंडल में एक नई और दुर्लभ नेबुला, यानी अंतरिक्ष में फैले गैस के विशाल बादल की खोज की है। उन्होंने इसे बबलगम नेबुला नाम दिया है। इस खोज को अमेरिकन एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी की शोध पत्रिका ने प्रकाशित कर मान्यता दी है।
मिश्रा ने बताया कि इसकी शुरुआती पहचान 2021 में हुई थी, जब टीम इस क्षेत्र की नैरोबैंड तस्वीरों का अध्ययन कर रही थी, यानी ऐसी गहरे अंतरिक्ष की तस्वीरें जो प्रकाश की खास तरंगदैर्घ्य को अलग करके दिखाती हैं। इसकी चमक और बनावट सामान्य नेबुला से अलग दिखी। इसके अस्तित्व की पुष्टि होने से पहले कई साल तक और विस्तृत जांच चली।
इस अध्ययन के मार्गदर्शक सुमित श्रीवास्तव ने बताया कि ज़्यादातर नेबुला हाइड्रोजन और सल्फर गैस से चमकते हैं, लेकिन बबलगम नेबुला में ये दोनों नहीं पाए गए। इसकी चमक सिर्फ दोहरी आयनित ऑक्सीजन गैस के उत्सर्जन से आती है। यह नेबुला पृथ्वी से लगभग 5,870 प्रकाश वर्ष दूर है और इसका व्यास 45 प्रकाश वर्ष से ज़्यादा है, यानी प्रकाश को इसके एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंचने में 45 साल से ज़्यादा समय लगेगा।
नासा के वरिष्ठ वैज्ञानिक हावर्ड ई. बॉन्ड और पैट्रिक एम. अब इस नई पहचानी गई नेबुला का अध्ययन कर रहे हैं। इस खोज ने दुनिया भर के खगोलविदों का ध्यान खींचा है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह खोज तारों के जीवन चक्र और सुपरनोवा विस्फोटों से जुड़ी प्रक्रियाओं को समझने में मदद कर सकती है। नेबुला उन जगहों पर भी बनती हैं जहां नए तारे जन्म लेते हैं, और कुछ तारों के जीवन के आखिरी चरण के बाद भी बनती हैं।
इसकी ऊर्जा का सटीक स्रोत क्या है और यह असल में किस तरह की खगोलीय संरचना है, यह जानने के लिए अब नेबुला के प्रकाश का विश्लेषण करने वाला विस्तृत स्पेक्ट्रोस्कोपिक अध्ययन किया जाना तय हुआ है।
शब्दों की व्याख्या
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