डार्क मैटर और क्वांटम ग्रेविटी पर भौतिकविदों में सहमति नहीं
दुनियाभर के भौतिकविदों के बीच हुए अब तक के सबसे बड़े सर्वेक्षण में डार्क मैटर, क्वांटम ग्रेविटी और मानक ब्रह्मांडीय मॉडल को लेकर बहुमत की सहमति नहीं बन पाई।
दुनियाभर के भौतिकविदों के बीच अब तक का सबसे बड़ा सर्वेक्षण बताता है कि डार्क मैटर, ब्लैक होल और क्वांटम ग्रेविटी जैसे भौतिकी के सबसे बड़े सवालों पर वैज्ञानिकों में भारी मतभेद है। वह अदृश्य पदार्थ जिसे ब्रह्मांड के अधिकांश द्रव्यमान का स्रोत माना जाता है, लेकिन जिसे अब तक खोजा नहीं जा सका है, उसे डार्क मैटर कहा जाता है। आइंस्टीन के गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत को क्वांटम भौतिकी से जोड़ने के अधूरे प्रयास को क्वांटम ग्रेविटी कहते हैं। ब्रह्मांड की बनावट और उसके विस्तार को समझाने वाला मानक ब्रह्मांडीय मॉडल, यानी लैम्ब्डा कोल्ड डार्क मैटर मॉडल (CDM), भी बहुमत का समर्थन हासिल नहीं कर सका।
इस सर्वेक्षण का नेतृत्व पेरिमीटर इंस्टीट्यूट के एसोसिएट फैकल्टी सदस्य और वाटरलू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर नियाएश अफशोर्दी ने किया। इसमें सह-लेखक फिल हाल्पर और अमेरिकन फिजिकल सोसाइटी की फिजिक्स मैगज़ीन भी शामिल थे। केवल दो सवालों पर बहुमत की सहमति बनी। 68% भौतिकविदों ने कहा कि बिग बैंग जरूरी नहीं कि समय की शुरुआत को दर्शाता हो, बल्कि यह केवल यह बताता है कि ब्रह्मांड एक अत्यंत गर्म, सघन अवस्था से कैसे विकसित हुआ। वहीं 51% की मामूली बहुमत ने माना कि प्रारंभिक ब्रह्मांड इन्फ्लेशन नामक तेज़ विस्तार के एक संक्षिप्त दौर से गुज़रा।
डार्क मैटर को लेकर सबसे ज़्यादा (21%) लोगों ने एक अकेले सिद्धांत के बजाय कई संभावित व्याख्याओं के मिश्रण का समर्थन किया। 17% ने अब तक न खोजे गए हल्के कणों की मौजूदगी की बात कही, जबकि 12% ने कहा कि गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत में ही बदलाव ज़रूरी है। क्वांटम ग्रेविटी के लिए स्ट्रिंग थ्योरी सबसे लोकप्रिय विचार बना रहा, लेकिन उसे भी केवल 19% का समर्थन मिला। लूप क्वांटम ग्रेविटी को 12% और यह विचार कि गुरुत्वाकर्षण को क्वांटम रूप में समझाया ही नहीं जा सकता, उसे 18% का समर्थन मिला।
CDM मॉडल पर घटते भरोसे की एक वजह पिछले साल के निष्कर्ष हो सकते हैं। ये निष्कर्ष डार्क एनर्जी स्पेक्ट्रोस्कोपिक इंस्ट्रूमेंट (DESI) से आए, जो ब्रह्मांड की डार्क एनर्जी को मापने वाला एक उपकरण है। इनसे पता चला कि ब्रह्मांड के विस्तार की गति बढ़ाने वाली मानी जाने वाली डार्क एनर्जी समय के साथ बदल सकती है। यह मानक मॉडल की उस धारणा के विपरीत है, जिसके अनुसार डार्क एनर्जी स्थिर रहती है। यह अध्ययन अफशोर्दी, हाल्पर, मैटियो रीनी और माइकल शर्बर द्वारा 10 मई, 2026 को arXiv पर प्रकाशित हुआ।
शब्दों की व्याख्या
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