बिना रुके बैठने का हर अतिरिक्त घंटा कैंसर से मौत का खतरा 9% बढ़ाता है
91,000 से अधिक वयस्कों पर हुए UK बायोबैंक अध्ययन में पाया गया कि केवल कुल बैठने का समय ही नहीं, बल्कि लंबे, बिना रुके बैठने के दौर भी कैंसर से मौत के अधिक जोखिम से जुड़े हैं।
दिन भर में अधिक कुल बैठने के समय की तुलना में, बिना उठे लंबे समय तक बैठे रहना ज़्यादा स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकता है, यूके के ग्लासगो विश्वविद्यालय के फ्रेडरिक हो के नेतृत्व में हुए एक नए अध्ययन के अनुसार। यह ओपन-एक्सेस पत्रिका PLOS मेडिसिन में प्रकाशित हुआ है। ये निष्कर्ष बताते हैं कि बैठने के समय की कुल मात्रा ही नहीं, बल्कि उसका पैटर्न भी स्वास्थ्य के लिए मायने रख सकता है।
शोधकर्ताओं ने UK बायोबैंक के 91,292 प्रतिभागियों का डेटा जांचा। हर प्रतिभागी ने सात दिनों तक एक गतिविधि मॉनिटर पहना, और समूह को औसतन 12.38 वर्षों तक फॉलो किया गया। उन्होंने कम से कम 30 मिनट तक चलने वाले और जिनमें कम से कम 90% समय बैठे रहना शामिल हो, ऐसे दौर को लंबा बिना रुका बैठना बताया। छोटे दौर या जिनमें 10% से अधिक समय हलचल शामिल हो, उन्हें बीच-बीच में टूटा हुआ बैठना बताया।
जिन लोगों में लंबा, बिना रुका बैठना अधिक था, उनमें हर अतिरिक्त घंटे के लिए कैंसर से मौत का जोखिम 9% अधिक पाया गया (हैज़र्ड रेशियो 1.09)। साथ ही कैंसर के कुल मामले और मोटापे से जुड़े कैंसर जैसे भोजन-नली, लिवर, किडनी, अग्न्याशय, बड़ी आंत-मलाशय, स्तन, अंडाशय और थायरॉइड कैंसर, तथा टाइप 2 डायबिटीज से जुड़े कैंसर का जोखिम भी अधिक था। बीच-बीच में टूटा हुआ बैठना इसके विपरीत, इन्हीं सभी मामलों में कम जोखिम दिखाता है। प्रतिदिन एक घंटे के लंबे बिना रुके बैठने को हल्की शारीरिक गतिविधि से बदलने पर कैंसर से मौत का जोखिम 12% कम पाया गया।
लेखकों का कहना है कि ये निष्कर्ष UK बायोबैंक के स्वयंसेवकों के एक ही समूह से मिले हैं, जो आम जनसंख्या की तुलना में अधिक शारीरिक रूप से सक्रिय होते हैं। चूंकि यह एक अवलोकन आधारित अध्ययन है, इसलिए यह साबित नहीं कर सकता कि लंबे समय तक बैठना सीधे कैंसर से मौत का कारण बनता है। शोधकर्ताओं के पास यह जानकारी भी नहीं थी कि प्रतिभागी किन परिस्थितियों में बैठे थे, जैसे काम के दौरान या गाड़ी चलाते समय।
शब्दों की व्याख्या
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