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ICMR-NIN अध्ययन: सीसा एक्सपोज़र अल्ज़ाइमर प्रोटीन के साथ मिलकर कोशिका क्षति बढ़ाता है

हैदराबाद के ICMR-राष्ट्रीय पोषण संस्थान ने पाया कि पर्यावरणीय सीसे का एक्सपोज़र, एमिलॉइड-बीटा प्रोटीन के साथ मिलकर, तंत्रिका कोशिकाओं के अपशिष्ट-निपटान तंत्र को अकेले की तुलना में कहीं ज़्यादा नुकसान पहुंचाता है।

चरण दर चरण

  1. 1

    तंत्रिका कोशिकाओं को केवल सीसे के संपर्क में रखा

  2. 2

    कोशिकाओं को केवल एमिलॉइड-बीटा के संपर्क में रखा

  3. 3

    दोनों को एक साथ संपर्क में रखा

  4. 4

    साथ में संपर्क से लाइसोसोम कामकाज बिगड़ा

  5. 5

    कोशिका जीवित रहने की दर तेज़ी से घटी

हैदराबाद स्थित ICMR-राष्ट्रीय पोषण संस्थान के शोधकर्ताओं ने एक अहम बात पाई है। अल्ज़ाइमर रोग की विकृति, यानी बीमारी की प्रक्रिया, में केंद्रीय भूमिका निभाने वाले प्रोटीन कणों को एमिलॉइड-बीटा कहा जाता है। इनकी मौजूदगी में पर्यावरणीय सीसे का संपर्क तंत्रिका कोशिकाओं के अपशिष्ट-निपटान तंत्र को काफी हद तक बिगाड़ सकता है। यह अध्ययन जर्नल ऑफ एप्लाइड टॉक्सिकोलॉजी नामक अंतरराष्ट्रीय पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।

शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला में मानव तंत्रिका कोशिकाओं पर सीसे और दो तरह के एमिलॉइड-बीटा प्रोटीन कणों के प्रभावों की जांच की। NIN शोधकर्ताओं ने एक बयान में बताया कि सीसा या एमिलॉइड-बीटा अकेले कोशिका के भीतरी अपशिष्ट-निपटान तंत्र, लाइसोसोम, के कामकाज को कुछ हद तक नुकसान पहुंचाते थे। लेकिन दोनों के एक साथ संपर्क में आने से कहीं ज़्यादा गड़बड़ी हुई: इससे कोशिकाओं के जीवित रहने की दर घटी, लाइसोसोम के सामान्य कामकाज के लिए ज़रूरी अम्लीय वातावरण बिगड़ा, और उनकी संरचना को भी नुकसान पहुंचा।

शोध टीम का नेतृत्व करने वाले ICMR-NIN में कोशिका जीव विज्ञान के प्रमुख और वैज्ञानिक-जी डॉ. सुरेश चल्ला ने कहा, "हमारे निष्कर्ष दिखाते हैं कि एमिलॉइड-बीटा की मौजूदगी में सीसे का संपर्क लाइसोसोम की खराबी को काफी बढ़ा सकता है। इन कोशिकीय बदलावों को समझने से हमें यह समझने में मदद मिल सकती है कि पर्यावरणीय एक्सपोज़र तंत्रिका कोशिका स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित कर सकते हैं।"

निष्कर्ष बताते हैं कि पर्यावरणीय सीसे का संपर्क एमिलॉइड-बीटा से जुड़े कोशिकीय तनाव को और बढ़ा सकता है, जिससे तंत्रिका कोशिकाएं क्षति के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती हैं। यह इस बात की एक और झलक भी देता है कि पर्यावरणीय कारक अल्ज़ाइमर रोग व डिमेंशिया जैसे न्यूरोडीजेनेरेटिव विकारों से जुड़े कोशिकीय बदलावों में कैसे योगदान दे सकते हैं। ICMR-NIN की निदेशक डॉ. भारती कुलकर्णी ने कहा कि यह अध्ययन मस्तिष्क स्वास्थ्य बनाए रखने में पर्यावरणीय प्रदूषकों और जैविक कारकों के बीच के संबंध को समझने के महत्व को रेखांकित करता है।

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