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चंद्रमा पर शहर बसाने लायक पानी नहीं? नए अध्ययन का दावा

चंद्रमा के स्थायी अंधेरे गड्ढों में जमी बर्फ किसी बड़े चंद्र शहर के लिए पर्याप्त नहीं होगी, एक नए फिजिबिलिटी अध्ययन में चेतावनी दी गई है — अच्छी रीसाइक्लिंग के बावजूद यह कुछ दशकों में खत्म हो सकती है।

चंद्रमा के ध्रुवों पर हमेशा अंधेरे में डूबे गड्ढों में बर्फ मिलने की खोज ने वहां बेस, गांव और शहर बसाने की महत्वाकांक्षी योजनाओं को हवा दी है। जेफ बेजोस और एलन मस्क जैसे उद्यमी चंद्रमा पर बड़े उद्योग और खुद-ब-खुद बढ़ने वाली बसावटों के सपने देख रहे हैं। जर्नल फ्रंटियर्स इन स्पेस टेक्नोलॉजीज़ में प्रकाशित एक नए फिजिबिलिटी अध्ययन ने एक बुनियादी सवाल उठाया है: क्या यह टिकाऊ है?

चंद्रमा के ध्रुवों के पास कई गड्ढों की तलहटी पर लगभग 4 अरब वर्षों से सीधी सूरज की रोशनी नहीं पड़ी है, और वहां तापमान 110 केल्विन से भी कम रहता है। इन बेहद ठंडे, स्थायी रूप से अंधेरे स्थानों को 'कोल्ड ट्रैप' कहा जाता है, जहां बर्फ 1 अरब वर्षों में एक मिलीमीटर से भी कम वाष्पित होती है। साल 2013 से चंद्रमा की परिक्रमा करने वाले मिशनों ने इन बर्फ भंडारों की मैपिंग की है, और अनुमान है कि क्षुद्रग्रहों की टक्करों से आई लगभग 1 अरब टन बर्फ यहां जमी हो सकती है।

अध्ययन के लेखकों के अनुसार बिजली कोई बड़ी बाधा नहीं होगी, क्योंकि इन अंधेरे गड्ढों के पास की चोटियों पर लगभग हमेशा सूरज की रोशनी रहती है। वहां किलोमीटर ऊंचे टावरों पर सोलर पैनल लगाकर 3 गीगावाट बिजली बनाई जा सकती है, जिससे चंद्रमा पर AI डेटा सेंटर तक चलाए जा सकते हैं।

पानी असली समस्या है। अध्ययन के मुताबिक, 1 अरब टन बर्फ होने और कोई रीसाइक्लिंग न होने पर भी, चंद्र शहर कुछ ही वर्षों में सूख जाएगा। अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर हासिल की गई 98% रीसाइक्लिंग दर अपनाने पर भी, 1 मिलियन की आबादी वाला शहर लगभग एक सदी में अपना पानी खत्म कर देगा। आज के सबसे बेहतर अनुमान बताते हैं कि चंद्रमा पर पानी उस 1 अरब टन के आंकड़े से लगभग 30 गुना कम है, जिससे एक छोटे शहर का पानी घटकर लगभग एक दशक तक सिमट जाएगा। हालांकि, 1,000 लोगों का एक गांव या 10,000 लोगों का एक कस्बा कई सदियों तक टिक सकता है।

शोधकर्ताओं ने कुछ संभावित उपाय सुझाए हैं: रीसाइक्लिंग क्षमता को कम-से-कम पांच गुना बढ़ाना, वर्टिकल फार्मिंग जैसी तकनीकों से पानी की खपत घटाना, आसपास के क्षुद्रग्रहों से पानी मंगाना, या फिर सीधे और पानी खोज लेना। चंद्रमा के पानी को लेकर अभी की सर्वेक्षण तकनीकें सतह से कुछ मीटर नीचे तक ही देख पाती हैं, जबकि चंद्रमा की ढीली चट्टानी-धूल की परत (रेगोलिथ) दसियों मीटर गहराई तक फैली है और उसमें अतिरिक्त बर्फ हो सकती है।

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