चूहों की ऑप्टिक नर्व फिर से बढ़ाने वाली जीन थेरेपी अब इंसानों पर परीक्षण में
आनुवंशिकीविद् युआनचेंग लू की उम्र-उलटने वाली जीन थेरेपी ने अंधे चूहों की ऑप्टिक नर्व को फिर से बढ़ाया, और अब इसके एक स्वरूप का ग्लूकोमा से पीड़ित एक इंसान पर पहली बार परीक्षण हुआ है।
चरण दर चरण
- 1
चूहों की ऑप्टिक नर्व कुचली गई
- 2
क्षतिग्रस्त आंखों में जीन थेरेपी डाली गई
- 3
16 दिनों में तंत्रिका तंतु फिर से बढ़े
- 4
चूहों ने रोशनी पहचानने की क्षमता पाई
- 5
ग्लूकोमा मरीज़ पर थेरेपी का परीक्षण
अमेरिका के मैसाचुसेट्स राज्य के कैम्ब्रिज शहर स्थित व्हाइटहेड इंस्टीट्यूट के आनुवंशिकीविद् हैं युआनचेंग (रयान) लू। उन्होंने 'रीप्रोग्रामिंग' नामक उम्र-उलटने वाली तकनीक का उपयोग कर क्षतिग्रस्त ऑप्टिक नर्व (दृष्टि तंत्रिका) को ठीक करने वाली एक जीन थेरेपी विकसित की है। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में पीएचडी करते समय ही लू ने यह तरीका बनाया था, और इस साल इसके एक स्वरूप का इंसानों पर परीक्षण शुरू हुआ।
2018 में लू ने चूहों की ऑप्टिक नर्व को कुचलकर उन्हें अंधा कर दिया, फिर उनकी आंख की कोशिकाओं में एक जीन थेरेपी डाली जो उन्हें फिर से युवा अवस्था में लाने के लिए बनाई गई थी। सोलह दिन बाद ये तंत्रिकाएं फिर से बढ़ने लगीं; माइक्रोस्कोप में इनके एक्सॉन पतले नारंगी रंग के धागों जैसे दिखे। बाद में घूमती हुई रोशनी की पट्टियों वाले एक बक्से में किए गए परीक्षणों में पाया गया कि चूहे उस हलचल को देख पा रहे थे — यानी वे फिर से देख सकते थे। यह नतीजा 2020 में नेचर (Nature) पत्रिका में प्रकाशित हुआ।
रीप्रोग्रामिंग वह प्राकृतिक प्रक्रिया है जो भ्रूण के भीतर डीएनए को फिर से सेट कर देती है, यही वजह है कि बच्चे बूढ़े नहीं बल्कि युवा जन्म लेते हैं। 2006 में जापानी वैज्ञानिकों ने दिखाया कि एक कोशिका में चार खास जीन डालकर प्रयोगशाला में यह प्रक्रिया करवाई जा सकती है, जिससे वह कोशिका ऐसी स्टेम सेल बन जाती है जैसे वह भ्रूण से ली गई हो। इन चार जीनों में से एक, जिसे 'मायक' (Myc) कहा जाता है, कैंसर जैसे खतरनाक बदलाव लाने की सबसे अधिक आशंका रखता है, इसलिए लू ने मायक को हटाकर बाकी तीन जीनों से ही अपनी थेरेपी बनाई। उनकी खास सूझ यह थी कि इस छोटी की गई थेरेपी को ऑप्टिक नर्व पर आज़माया जाए, क्योंकि आंख तक आसानी से पहुंचा जा सकता है।
9 जून को स्टार्टअप लाइफ बायोसाइंसेज ने बताया कि उसने इस थेरेपी के एक स्वरूप को, जिसे अब 'ईआर-100' (ER-100) कहा जाता है, ग्लूकोमा (आंख के दबाव की बीमारी) से पीड़ित एक व्यक्ति की आंख में डाला। यह इस थेरेपी का किसी इंसान पर पहला इस्तेमाल था।
लू का कहना है कि यह थेरेपी अब भी कई तरह की कोशिकाओं के लिए विषैली बनी हुई है, और हर तरह की कोशिका में उम्र बढ़ने के पीछे अलग-अलग कारक काम करते हैं। इस साल उन्होंने एक ऐसा जीन खोजा जो रेटिना को फ्री रेडिकल्स (कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने वाले अणु) से बचाता है — उम्र से जुड़ी मैक्युलर डिजनरेशन बीमारी का यही मुख्य कारण है। वे अपने शुरुआती चूहों वाले काम को पूरा इलाज नहीं, बल्कि सिर्फ एक अवधारणा-सिद्ध प्रयोग बताते हैं।
शब्दों की व्याख्या
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