पहले दिमाग में दर्द का नक्शा, फिर बिजली से इलाज — स्टैनफर्ड टीम का नया तरीका
स्टैनफर्ड के शोधकर्ताओं ने अस्थायी इलेक्ट्रोड से हर मरीज के दर्द के संकेतों का नक्शा बनाया, फिर उन्हीं जगहों पर बिजली दी। चेहरे के गंभीर पुराने दर्द से जूझ रहे तीन में से दो लोगों को आराम मिला।
चरण दर चरण
- 1
खोपड़ी के छेदों से अस्थायी इलेक्ट्रोड लगे
- 2
तीन दिन तक परीक्षण के लिए बिजली
- 3
हर मरीज के दर्द का नक्शा बना
- 4
जहाँ असर हुआ, वहाँ स्थायी तार लगे
वैज्ञानिकों ने पहले यह पता लगाया कि दिमाग में दर्द कहाँ बनता है, फिर ठीक उन्हीं जगहों पर बिजली देकर दो लोगों का गंभीर पुराना दर्द कम किया। यह छोटा केस स्टडी समूह 30 जुलाई को जर्नल ब्रेन स्टिमुलेशन में छपा है और बताता है कि सही जगह मिल जाए तो जिद्दी दर्द के संकेत भी रोके जा सकते हैं। हाथ टूटने के तेज दर्द से अलग, पुराना दर्द दिमाग और रीढ़ की हड्डी में आए बदलावों से पैदा होता है और घाव भरने के बाद भी बना रहता है।
इसका एक मौजूदा तरीका डीप ब्रेन स्टिमुलेशन (DBS) है, जिसमें पतले तारों पर लगे इलेक्ट्रोड दिमाग में और बैटरी पैक सीने में लगाया जाता है। DBS सबसे ज्यादा पार्किंसंस रोग में इस्तेमाल होता है और अवसाद जैसी दूसरी बीमारियों के लिए इस पर शोध चल रहा है। लेकिन पुराने दर्द में DBS के नतीजे एक जैसे नहीं रहे — कुछ लोगों पर काम किया, कुछ पर नहीं।
इसकी वजह शायद यह है कि दर्द बनता कैसे है। स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी के न्यूरोसर्जन और न्यूरोसाइंटिस्ट विवेक बुच के मुताबिक दर्द का अनुभव दिमाग के कई नेटवर्क मिलकर बनाते हैं — कुछ संवेदी सूचना संभालते हैं, कुछ रासायनिक संकेत और कुछ भावनात्मक पहलू। उन्होंने कहा, “किसी तरह ये सब मिलकर एक जुड़ा हुआ संकेत बन जाते हैं, जिससे इंसान को दर्द महसूस होता है।” उनके अनुसार पुराना दर्द, अवसाद और ऑब्सेसिव-कंपल्सिव डिसऑर्डर “सबके लिए एक जैसे नहीं होते।”
बुच और उनके साथियों ने चेहरे के गंभीर पुराने दर्द वाले तीन लोगों को शामिल किया। खोपड़ी में छोटे छेदों से दिमाग के अहम हिस्सों में अस्थायी इलेक्ट्रोड डाले गए, और अगले तीन दिन तक अलग-अलग जगहों पर बिजली के छोटे-छोटे संकेत भेजकर देखा गया कि किस जगह से किसका दर्द बदलता है। एक व्यक्ति को किसी भी संयोजन से खास राहत नहीं मिली; दो को मिली। इसके बाद 40 की उम्र वाली एक महिला के दिमाग में उन हिस्सों में चार स्थायी इलेक्ट्रोड तार लगाए गए, और छह तथा 12 महीने बाद भी वे बेहतर महसूस कर रही हैं। दूसरी महिला जल्द ही स्थायी इम्प्लांट लगवाने की योजना बना रही हैं।
स्टैनफर्ड के न्यूरोसाइंटिस्ट, मनोचिकित्सक और हावर्ड ह्यूज मेडिकल इंस्टीट्यूट के अन्वेषक कार्ल डाइसेरोथ ने कहा कि यह पहचान लेना कि कोई इलाज काम नहीं करेगा, सफलता जितना ही अहम है। अध्ययन में शामिल न रहे स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन के न्यूरोसर्जन माइकल लिम ने कहा कि ऐसे मरीजों के लिए डॉक्टर अब तक बहुत कम कर पाए हैं।
शब्दों की व्याख्या
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