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यूरोपीय लोगों को कीड़े न खाने की आदत का जीन 9,000 साल पुराना?

प्राचीन दांतों के जीनोम अध्ययन से पता चला है कि उत्तरी यूरेशिया के आधुनिक मनुष्य शायद ही कभी कीड़े खाते थे, जबकि निएंडरथल अक्सर खाते थे। इस अंतर की जड़ें खेती शुरू होने के समय तक जाती हैं।

जलवायु परिवर्तन और बढ़ती आबादी वैश्विक खाद्य प्रणालियों पर दबाव डाल रही है, इसलिए कीड़ों को एक टिकाऊ खाद्य स्रोत के रूप में ज़्यादा चर्चा में लाया जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन ने खाने योग्य 1,611 कीट प्रजातियों को चिन्हित किया है, और दुनिया भर में करोड़ों लोग पहले से ही कीड़े खाते हैं। फिर भी कई पश्चिमी समाज कीड़े खाने यानी एंटोमोफैगी को लेकर सख्त नापसंदगी रखते हैं। स्पेन की सीएसआईसी शोध परिषद और पॉम्पेउ फाब्रा विश्वविद्यालय के संयुक्त केंद्र, इंस्टीट्यूट ऑफ इवोल्यूशनरी बायोलॉजी (IBE) के एक नए अध्ययन ने जीनोम आधारित सबूतों से पता लगाया कि यह नापसंदगी कितनी पुरानी है।

साइंस एडवांसेज में छपे इस अध्ययन में टीम ने 33,000 साल पुराने आधुनिक मनुष्यों के दांतों की मैल यानी टार्टर के 745 नमूनों की जांच की। टार्टर में किसी व्यक्ति के नियमित रूप से खाए गए जीवों का डीएनए फंसकर सुरक्षित रह सकता है। नतीजों से पता चला कि उत्तरी यूरेशिया के आधुनिक मनुष्य नियमित रूप से कीड़े नहीं खाते थे। कीट के कठोर खोल यानी काइटिन को तोड़ने वाले जीन में उत्तरी यूरेशियाई आबादी में ऐसे बदलाव मिले जो कीड़े पचाने की क्षमता कम करते हैं। यह पैटर्न खेती शुरू होने के समय से यानी करीब 9,000 साल से बना हुआ है। अध्ययन का नेतृत्व करने वाले IBE शोधकर्ता पाब्लो लिब्रादो ने कहा, 'उत्तरी यूरेशियाई लोगों के खाने में कीड़ों की बेहद कम मौजूदगी एक अहम संकेत है। यह बताती है कि एंटोमोफैगी की अनुपस्थिति सिर्फ़ हाल की सांस्कृतिक वजहों से नहीं, बल्कि एक लंबे पारिस्थितिक और विकासवादी इतिहास से भी जुड़ी है'।

निएंडरथल में अलग पैटर्न दिखा। उनके दांतों की मैल में काफ़ी ज़्यादा कीट डीएनए मिला। यह उतना ही था जितना पश्चिमी चिंपांज़ी में मिलता है, जो सूखे के दौरान कीड़ों से अपना आहार पूरा करते हैं। इसमें ज़्यादातर डीएनए डिप्टेरा समूह का था, जिसमें मक्खियां और मच्छर आते हैं, और मच्छर का डीएनए ख़ासतौर पर ज़्यादा था। यह इस विचार का समर्थन करता है कि निएंडरथल अक्सर मक्खी के लार्वा वाले जानवरों के शव खाते थे, शायद दलदली इलाकों में रखे गए शवों से, जहां मच्छर अंडे देते हैं। निएंडरथल के काइटिन-पाचन जीन बेहतर कीट-पाचन क्षमता दिखाते थे, और अध्ययन में शामिल एकमात्र डेनिसोवन नमूने में भी यही पैटर्न मिला।

प्राचीन और आधुनिक, दोनों तरह के नमूनों में, उष्णकटिबंधीय इलाकों के करीब रहने वाली आबादी में काइटिन पचाने वाले एंज़ाइम को ज़्यादा सक्रिय करने वाले जीन प्रकार मिलने की संभावना ज़्यादा थी। अध्ययन के प्रमुख लेखक मैनुएल पिनेरो ने कहा, 'कीड़े जुटाने में लगने वाली ज़्यादा ऊर्जा की भरपाई के लिए बड़ी मात्रा में कीड़े खाने पड़ते हैं'। उन्होंने आगे कहा, 'उष्णकटिबंधीय इलाकों में दीमक और टिड्डी जैसे सामाजिक कीड़े ज़्यादा मिलते हैं। इनकी संख्या और विविधता साल भर टिकाऊ ढंग से इन्हें जुटाने का मौका देती है।' जैसे-जैसे आबादी ऊंचे अक्षांशों की ओर फैली, इन पाचन एंज़ाइमों की सक्रियता धीरे-धीरे घटती गई। यह स्थिति कम से कम 9,000 साल से बनी हुई है।

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